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अलीराजपुर

एक सप्ताह से गुंज रही कुर-कुर भरी कुर्राटिया, ढोल, मांदल, थाली एवं घुंघरूओ की खनक आगामी वर्ष के लिए हुई शांत,सभी ने कहा भगोरिया को बाय-बाय, फिर मिलेंगे अगले साल

रफ़ीककुरेशी।अलीराजपुर आदिवासी लोक संस्कृति का प्रतिक एवं विश्व में प्रसिद्ध भगोरिया मेले का समापन बुधवार को जिले के ग्राम चांदपुर, बरझर और बोरी के भगोरिया मेले के साथ हो गया। अंतिम दिन उक्त स्थानो पर भराए भगोरिया मेले का आदिवासी समाज के हजारो लोगो ने जमकर आनंद उठाया। भगोरिया मेले को लेकर जिला कांग्रेस अध्यक्ष महेश पटेल और विधायक मुकेश पटेंल ने अपने सेकड़ो समर्थकों के साथ चांदपुर मेले में शिरकत कर मांदल बजाकर ग्रामीणों को जमकर थिरकाया। वही भाजपा नेता भदु भाई पचाया ने भी भगोरिया मैले कि ग्रामीणों को शुभकामनाएं दी। जोबट विधायक सुश्री कलावती भुरिया ने भी बरझर मेले में पहुंचकर ग्रामीणों के बीच भगोरिया मनाया। इसी के साथ जिले में एक सप्ताह से गुंज रही कुर्राटिया बज रहे ढोल, मांदल, थाली व घुंघरूओ की खनक एक वर्ष के लिए शांत हो गई। भगोरिये मेलो में झुला चकरी का आनंद लेने के लिए आसपास के क्षेत्रो से सैकड़ो की संख्या में ग्रामीण पहुंचे और आनन्द उठाया। युवाओ की टोलिया नाचते गाते हुए निकले।
जिले में 16 भगोरिया मेलो का हुआ आयोजन
जिले के लोकप्रिय भगोरिया वालपुर, अलीराजपुर, बखतगढ़ क्षेत्र का रहा, जहा पर भगोरिया की सभी पंरपराओ का पालन किया गया। अन्य स्थानो के भगोरिये भी विषेष उत्साह से लबरेज नजर आए। कुल मिलाकर जिले मंे भगोरिये पर्व का पुरा आयोजन शांति व उल्लास के साथ संपंन हो सका। मेलो को लेकर प्रशासन ने सुरक्षा के माकूल इंतजाम किए थे। सात दिनो तक चले इस पर्व के दौरान पुरे जिले मंे लाखो आदिवासी परिवारो ने अपने पर्व की परंपराओ का निर्वहन करने मंे कोई कसर नही छोड़ी। हंसते गाते अपने दुख कष्टो आदि की चिंता को दुर करते हुए क्षेत्र के आदिवासियांे ने भगोरिया की रंगत को आज के समय मंे भी कायम रखा हुआ है।
कल से उजाड़िया प्रारम्भ
आदिवासी अंचल के इस जिले में भगोरिया प्रारंभ होने के पुर्व साथ दिनो तक हर जगह त्योहारियां हाट भरता है। त्यौहारिया हाट में आदिवासी लोग जमकर खरिददारी करते है। उसके बाद के सात दिनो भगोरिया में अपने दुर के रिश्तेदारो, परिचितो से मिलते-जुलते है। उनके साथ मिलजुल कर खुब मोज मस्ती करते है। भगोरिया समाप्ती एवं होलिका दहन के बाद सात दिनो तक अपने घरो में रहकर आराम करते है जिसे उजाड़िया कहते है। इन साथ दिनो में जमकर खाने-पिने का आनंद लिया जाता है। इस दौरान अपने सभी कामकाज को छोड़कर बाजारो में भी न के बराबर आते है। वे अपने फलिये के कुछ लोगो के साथ अलग-अलग दल बनाकर मार्ग पर आने जाने वाले वाहनो व लोगो को रोककर उनसे गोट मांगते है। गोट में प्राप्त राशी का उपयोग वे समुह के अन्य सदस्यो की सहमती से मिल बाटकर पार्टी मनाते है।
परराईबुडलिया का चलन आज भी जारी
आदिवासी समाज में वर्षो से चली आ रही राई बुडलिया बनने की परंपरा आज भी जारी है। समाज के विरेंद्रंसिंह का कहना है कि जो व्यक्ति मन्नत लेता है और मन्नत पुरी हो जाने पर वह राई बुडलिया बनता है। राई बुडलिया बनने वाले घर-घर जाकर ढोल बजाकर गोट मंागते है। गोट मंे मिलने वाले पैसो से वे अपने साथियो के साथ मिलकर जमकर दावत उड़ाते है। इन राई बुडलियो का इंतजार विशेष रूप से बच्चो मंे ज्यादा रहता है। बच्चें इनके पिछे-पिछे राई मारी बायर बुडलियो थारा पुरया कहकर इन्हें चिढ़ाते हुए चलते है। समुह के रूप में ढोल-मांदल लेकर बजाते हुए नाचते गाते है।

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